पुस्तक का शीर्षक

प्राची दिशि: भारतवर्ष की पूर्वी दिशा में स्थित राज्यों का इतिहास

लेखक: अनूप सिंहा

विषय-सूची (भूमिका भाग के लिए)

1. प्रस्तावना (Preface)
2. भूमिका: प्राची का स्वरूप और महत्व (Introduction: The Nature and Importance of Prācī)
  · 2.1. 'प्राची' शब्द का अर्थ और वैदिक संकल्पना
  · 2.2. दिशाओं का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
  · 2.3. प्राची दिशि का भौगोलिक विस्तार: गंगा से 'आगे' तक
3. ऐतिहासिक स्रोत: प्राची के इतिहास के आधार (Historical Sources)
  · 3.1. भारतीय स्रोत: महाकाव्य, पुराण और जातक कथाएँ
  · 3.2. विदेशी स्रोत: चीनी यात्रियों के वृत्तांत
  · 3.3. पड़ोसी दृष्टिकोण: बर्मी और तिब्बती इतिहास
  · 3.4. पुरातत्व और मुद्राशास्त्र के साक्ष्य
  · 3.5. मणिपुरी 'पुया' का विशेष महत्व
4. प्राचीन पूर्वी भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि (Political and Cultural Background)
  · 4.1. वैदिक काल में पूर्व की उपेक्षा और बाद में उदय
  · 4.2. महाभारत काल में पूर्वी राज्यों की भूमिका
  · 4.3. 'भारतीयकरण' और पूर्वी राज्यों पर इसका प्रभाव
5. प्राची दिशि के राज्यों का परिचयात्मक अवलोकन (Introductory Overview of the Eastern Kingdoms)
  · 5.1. मध्य प्रदेश और उड़ीसा क्षेत्र के राज्य
  · 5.2. बंगाल और असम के राज्य
  · 5.3. मणिपुर और उसके आगे के राज्य
6. पुस्तक की संरचना और उद्देश्य (Structure and Objective of the Book)
7. निष्कर्ष (Conclusion)
8. संदर्भ ग्रंथ सूची (Bibliography)

1•प्रस्तावना (Preface)

(लगभग 1 पृष्ठ)

भारतवर्ष का इतिहास लिखते समय प्रायः हमारा ध्यान उत्तर-पश्चिम की ओर केंद्रित हो जाता है, जहाँ से होकर अनेक आक्रमणकारी और व्यापारी आए। सिंधु घाटी की सभ्यता और गंगा-यमुना के मैदानों के शक्तिशाली राज्यों ने इतिहासकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। किंतु भारत की पूर्वी दिशा, जिसे वैदिक और महाकाव्य काल में 'प्राची' कहा गया, का इतिहास उतना ही समृद्ध, रहस्यमय और महत्वपूर्ण है।

'प्राची' केवल एक दिशा नहीं थी; यह एक भावना थी, सूर्योदय की पहली किरणों से स्पर्श होने वाली पवित्र भूमि थी। यह वह मार्ग था जहाँ से भारतीय संस्कृति, धर्म और व्यापार ने दक्षिण-पूर्व एशिया के विशाल क्षेत्र में प्रवेश किया। इस पुस्तक का उद्देश्य उन राज्यों के इतिहास को उजागर करना है जो इस प्राची दिशि में बसे थे - अंग के कर्ण की वीरभूमि से लेकर, वंग के समृद्ध बंदरगाहों से होते हुए, प्राग्ज्योतिष्पुर के रहस्यमय पर्वतों तक और अंत में मणिपुर की हरी-भरी घाटी तक, जहाँ अर्जुन का पुत्र बभ्रुवाहन राजा बना।

यह पुस्तक केवल एक ऐतिहासिक विवरण नहीं है, बल्कि एक ऐसे विस्मृत भूगोल की खोज है जो आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना में जीवित है। इसे लिखने के लिए मैंने महाभारत और पुराणों के संस्कृत ग्रंथों से लेकर, चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा-वृत्तांतों, बर्मी राजकीय इतिहास और मणिपुर की पवित्र 'पुया' पांडुलिपियों तक का सहारा लिया है। यह एक विनम्र प्रयास है उस विराट इतिहास की झलक पाने का जो प्राची दिशि के उस पार बसा है।

श्री अनूप सिंहा ,श्रीभूम, असम 

   भूमिका: प्राची का स्वरूप और महत्व

(Introduction: The Nature and Importance of Prācī)

(लगभग 4-5 पृष्ठ)

2.1. 'प्राची' शब्द का अर्थ और वैदिक संकल्पना

'प्राची' शब्द संस्कृत की 'प्राच्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'सामने' या 'आगे'। जैसे ही सूर्य का उदय होता है, उसकी किरणें सीधी हमारे सामने पड़ती हैं। इसलिए, सूर्योदय की इस दिशा को 'प्राची' या 'प्राची दिक्' (पूर्व दिशा) कहा गया।

ऋग्वेद में ही दिशाओं का उल्लेख मिल जाता है। पूर्व दिशा को देवताओं की दिशा माना गया। यह वह स्थान है जहाँ से उषा (भोर) और सूर्य (सविता) प्रकट होते हैं, जीवन और ऊर्जा का संचार करते हैं। यह केवल एक भौगोलिक स्थिति नहीं, अपितु आध्यात्मिक महत्व रखने वाली दिशा थी।

2.2. दिशाओं का राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व

प्राचीन काल में दिशाओं का राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरा महत्व था। राजा अपनी प्रजा की रक्षा के लिए दिशाओं का स्वामी बनना चाहता था। 'दिग्विजय' की अवधारणा इसी सोच से उपजी थी - एक ऐसा राजा जो सभी दिशाओं में अपनी विजय पताका फहरा चुका हो।

पूर्व दिशा, अर्थात् प्राची, का विशेष महत्व इसलिए भी था क्योंकि यह व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मुख्य मार्ग थी। यहीं से होकर भारतीय व्यापारी, विद्वान और धर्मप्रचारक सुवर्णभूमि (दक्षिण-पूर्व एशिया) की ओर प्रस्थान करते थे। इसलिए प्राची के राज्य केवल राजनीतिक इकाइयाँ नहीं थे, बल्कि वे सभ्यता के द्वार भी थे, जिनसे होकर भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ।

2.3. प्राची दिशि का भौगोलिक विस्तार: गंगा से 'आगे' तक

इस पुस्तक में 'प्राची दिशि' की हमारी परिभाषा व्यापक है। यह केवल आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार के पूर्वी भाग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वे सभी क्षेत्र शामिल हैं जिन्हें प्राचीन भारतीय साहित्य में पूर्व की ओर स्थित बताया गया है। यह विस्तार कुछ इस प्रकार है:

· मध्य भारत का पूर्वी भाग: जहाँ से चंबल और सोन नदियाँ बहती हैं।

· उड़ीसा (कलिंग, उत्कल): जो अपने वीर योद्धाओं और बौद्ध धर्म के केंद्रों के लिए प्रसिद्ध था।

· बंगाल (वंग, पुण्ड्र, गौड़, राढ़): जो गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा की उर्वर भूमि और समुद्री व्यापार का केंद्र था।

· असम (प्राग्ज्योतिष्पुर, कामरूप): जो लौहित्य नदी (ब्रह्मपुत्र) के तट पर बसा रहस्यों का देश था, जो तिब्बत और चीन से जुड़ा हुआ था।

· मणिपुर और आगे के पर्वतीय राज्य: जिन्हें महाभारत में 'मणिपुर' और 'किरात' क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है, और जो आगे चलकर बर्मा और दक्षिण-पूर्व एशिया के राज्यों से जुड़े।

इस प्रकार, यह पुस्तक उस विशाल भू-भाग का अध्ययन करेगी जो आधुनिक भारत के पूर्वी राज्यों से शुरू होकर, म्यांमार की सीमाओं तक फैला हुआ है।

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3. ऐतिहासिक स्रोत: प्राची के इतिहास के आधार

(Historical Sources)

(लगभग 5-6 पृष्ठ)

इस पुस्तक को लिखने के लिए हमने विभिन्न भाषाओं और परंपराओं में बिखरे हुए ऐतिहासिक स्रोतों का सहारा लिया है। ये स्रोत निम्नलिखित हैं:

3.1. भारतीय स्रोत: महाकाव्य, पुराण और जातक कथाएँ

प्राची दिशि के राज्यों की सबसे प्राचीन जानकारी हमें भारतीय महाकाव्यों और पुराणों से मिलती है।

· महाभारत: महाभारत में अनेक स्थानों पर पूर्वी राज्यों का उल्लेख है। भीम की दिग्विजय (सभापर्व) में उसने जिन पूर्वी राज्यों को जीता, उनका विस्तृत वर्णन है। कर्ण द्वारा अंग राज्य की प्राप्ति, तथा अर्जुन के मणिपुर प्रवास और बभ्रुवाहन की कहानी (अश्वमेध पर्व) इस क्षेत्र के इतिहास के लिए अमूल्य हैं।

· रामायण: रामायण में भी वनगमन के दौरान पूर्वी क्षेत्रों का उल्लेख आता है, हालाँकि इसका मुख्य केंद्र दक्षिण और पश्चिम अधिक है।

· पुराण: विष्णु पुराण, वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि में विभिन्न राजवंशों और उनके राज्यों की सूचियाँ मिलती हैं। 'कालिका पुराण' तो विशेष रूप से कामरूप (असम) के इतिहास और भूगोल के लिए एक प्रमुख स्रोत है।

· जातक कथाएँ: बौद्ध साहित्य के इस महत्वपूर्ण भाग में बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं। इनमें वंग, कलिंग, कामरूप आदि क्षेत्रों के व्यापारियों, राजाओं और नगरों का वर्णन मिलता है, जो उस समय के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर प्रकाश डालता है।

3.2. विदेशी स्रोत: चीनी यात्रियों के वृत्तांत

जहाँ भारतीय स्रोत पौराणिक हैं, वहीं चीनी यात्रियों के विवरण अधिक ऐतिहासिक और भौगोलिक हैं।

· ह्वेन त्सांग (Xuanzang) - 7वीं शताब्दी: इस प्रसिद्ध चीनी यात्री ने कामरूप (असम) का दौरा किया और वहाँ के राजा भास्करवर्मन से मुलाकात की। उसके यात्रा-वृत्तांत 'सी-यू-की' में पूर्वी भारत के राज्यों की स्थिति, संस्कृति और बौद्ध धर्म की स्थिति का विस्तृत वर्णन है।

· इत्सिंग (I-Tsing) - 7वीं शताब्दी: उसने भी बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए भारत की यात्रा की और पूर्वी भारत के बौद्ध केंद्रों का उल्लेख किया।

· मिंग राजवंश के इतिहास (Ming Shih): इन चीनी अभिलेखों में 15वीं शताब्दी के दौरान पूर्वी राज्यों, विशेषकर 'चीह-ती-येन' (जिसे हम मणिपुर के रूप में पहचानते हैं) के साथ राजनयिक संबंधों का वर्णन है। यह स्रोत बताता है कि प्राची के राज्य केवल भारत तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनके अंतर्राष्ट्रीय संबंध भी थे।

3.3. पड़ोसी दृष्टिकोण: बर्मी और तिब्बती इतिहास

पूर्वी राज्यों, विशेषकर मणिपुर और असम, के इतिहास को समझने के लिए पड़ोसी देशों के इतिहास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

· बर्मी इतिहास (हमान्नान याज़ाविन): बर्मा का राजकीय इतिहास, 'ग्लास पैलेस क्रॉनिकल', मणिपुर को 'काथे' के नाम से पुकारता है और उसके साथ हुए युद्धों, संधियों और राजनीतिक संबंधों का वर्णन करता है। यह हमें मणिपुर के उस इतिहास की झलक देता है जो भारतीय स्रोतों में नहीं मिलता।

· तिब्बती इतिहास: तिब्बती इतिहासकार तारानाथ (Taranatha) ने अपने ग्रंथों में भारत के इतिहास और बौद्ध धर्म के प्रसार का वर्णन किया है, जिसमें पूर्वी भारत की घटनाओं का भी उल्लेख है।

3.4. पुरातत्व और मुद्राशास्त्र के साक्ष्य

· शिलालेख: समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख) पूर्वी राज्यों की सूची और उनके साथ गुप्त साम्राज्य के संबंधों का एक ठोस प्रमाण है। कामरूप के राजाओं के ताम्रपत्र और शिलालेख भी महत्वपूर्ण हैं।

· सिक्के: पूर्वी राज्यों द्वारा जारी किए गए सिक्के (जैसे, चंद्र राजवंश के सिक्के) उनके आर्थिक इतिहास और राजनीतिक विस्तार के बारे में जानकारी देते हैं।

· खंडहर और मूर्तियाँ: नालंदा, विक्रमशिला, मैनामती (बांग्लादेश) और कामरूप के पुरातात्विक स्थल प्राची की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के मूक गवाह हैं।

3.5. मणिपुरी 'पुया' का विशेष महत्व

प्राची दिशि के सबसे पूर्वी छोर पर स्थित मणिपुर के इतिहास के लिए 'पुया' नामक ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये हजारों वर्षों से मैतेई समुदाय द्वारा संरक्षित हस्तलिखित पांडुलिपियाँ हैं।

· चीथरोल कुम्बाबा: यह मणिपुर के राजाओं का राजकीय इतिहास है, जो 33 ईस्वी में राजा पखांगबा के राज्याभिषेक से शुरू होकर 20वीं शताब्दी तक का वर्णन करता है। इसमें बभ्रुवाहन से लेकर आधुनिक राजाओं तक की वंशावली मिलती है।

· अन्य पुयाएँ: धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर आधारित ये ग्रंथ (जैसे लीरेल नोंगचुप लोन, नोंगसामेई पुया) उस क्षेत्र के विश्वासों, परंपराओं और इतिहास को समझने के लिए अपरिहार्य हैं।

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4. प्राचीन पूर्वी भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

(Political and Cultural Background)

(लगभग 4-5 पृष्ठ)

4.1. वैदिक काल में पूर्व की उपेक्षा और बाद में उदय

प्रारंभिक वैदिक काल में आर्यों का केंद्र सप्त सिंधु क्षेत्र (पंजाब) था। उस समय पूर्वी क्षेत्रों को 'आर्यावर्त' के बाहर माना जाता था। ऋग्वेद में पूर्वी नदियों (गंगा, यमुना) का उल्लेख कम है। लेकिन ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों के समय तक, आर्यों का विस्तार पूर्व की ओर बढ़ने लगा और गंगा-यमुना का मैदान सभ्यता का नया केंद्र बन गया।

4.2. महाभारत काल में पूर्वी राज्यों की भूमिका

महाभारत काल तक, पूर्वी राज्य पूरी तरह से राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके थे। ये राज्य केवल उपेक्षित क्षेत्र नहीं रह गए थे, बल्कि वे शक्तिशाली और प्रभावशाली हो गए थे।

· कौरवों और पांडवों के सहयोगी: महाभारत युद्ध में अंग, वंग, कलिंग और पुण्ड्र के राजा कौरवों की ओर से लड़े थे। इससे पता चलता है कि उनकी सेनाएँ कितनी शक्तिशाली थीं और उनका राजनीतिक महत्व कितना बढ़ चुका था।

· वैवाहिक संबंध: अर्जुन का मणिपुर की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह और वहाँ के राजा बनने की कहानी बताती है कि मध्य देश के राजाओं के साथ पूर्वी राज्यों के वैवाहिक और राजनीतिक संबंध थे। इससे यह क्षेत्र महाकाव्य की मुख्यधारा में आ गया।

4.3. 'भारतीयकरण' और पूर्वी राज्यों पर इसका प्रभाव

महाभारत काल के बाद, पूर्वी राज्यों पर 'भारतीयकरण' की एक लंबी प्रक्रिया चली। इसका अर्थ था, संस्कृत भाषा, वैदिक धर्म और बाद में बौद्ध धर्म, तथा भारतीय राजनीतिक अवधारणाओं (जैसे राजत्व और दिग्विजय) का इन क्षेत्रों में प्रसार। यह प्रक्रिया दो तरह से हुई:

1. संस्कृतिकरण: स्थानीय राजाओं और अभिजात वर्ग ने अपनी उत्पत्ति को भारतीय पौराणिक पात्रों (जैसे सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, या महाभारत के नायकों) से जोड़ना शुरू किया।

2. धार्मिक प्रसार: बौद्ध भिक्षु और ब्राह्मण पूर्वी क्षेत्रों में गए और वहाँ के लोगों को नए धार्मिक और दार्शनिक विचारों से अवगत कराया। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय इस ज्ञान के प्रसार के केंद्र बने।

पूर्वी राज्यों ने इस भारतीयकरण को आत्मसात किया, लेकिन साथ ही अपनी स्थानीय पहचान और परंपराओं को भी बनाए रखा। यही कारण है कि हमें असम में 'कामाख्या' जैसी स्थानीय देवी की पूजा और साथ ही संस्कृत साहित्य का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।

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5. प्राची दिशि के राज्यों का परिचयात्मक अवलोकन

(Introductory Overview of the Eastern Kingdoms)

(लगभग 3-4 पृष्ठ)

इस पुस्तक में हम प्राची दिशि के निम्नलिखित प्रमुख राज्यों का विस्तार से अध्ययन करेंगे:

5.1. मध्य प्रदेश और उड़ीसा क्षेत्र के राज्य

· चेदि: सोन नदी के किनारे बसा यह राज्य शिशुपाल जैसे शक्तिशाली राजा के लिए प्रसिद्ध है।

· कलिंग (उड़ीसा): अपने वीर योद्धाओं और समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध। समुद्रगुप्त ने इसे जीता, लेकिन बाद में यह एक शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य बन गया। खारवेल जैसे राजाओं ने इसकी शक्ति को बढ़ाया।

· उत्कल और तोशली: कलिंग के पड़ोसी क्षेत्र, जिनका उल्लेख महाभारत और पुराणों में मिलता है। तोशली बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

5.2. बंगाल और असम के राज्य

· वंग (दक्षिणी बंगाल): समुद्री व्यापार का केंद्र। यहाँ से व्यापारी सुवर्णभूमि (दक्षिण-पूर्व एशिया) जाते थे।

· पुण्ड्र (उत्तरी बंगाल): इसकी राजधानी पुण्ड्रनगर (महास्थानगढ़, बांग्लादेश) थी। यह एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था।

· गौड़ (पश्चिम बंगाल): बाद के काल में यह बंगाल का सबसे प्रसिद्ध राज्य बना। गौड़ के राजा शशांक (7वीं शताब्दी) एक शक्तिशाली शासक थे।

· प्राग्ज्योतिष्पुर / कामरूप (असम): यह प्राची का सबसे रहस्यमय और शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी प्राग्ज्योतिष्पुर (वर्तमान गुवाहाटी के पास) थी। यहाँ के राजा भगदत्त ने महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था। बाद में, राजा भास्करवर्मन (7वीं शताब्दी) के शासन में यह अपने चरम पर था।

5.3. मणिपुर और उसके आगे के राज्य

· मणिपुर: यह क्षेत्र महाभारत की कथा (अर्जुन और बभ्रुवाहन) के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की सभ्यता का अपना अलग और समृद्ध इतिहास है, जो मैतेई लोगों की 'पुया' नामक पांडुलिपियों में सुरक्षित है।

· किरात राज्य: हिमालय की पूर्वी ढलानों पर बसे विभिन्न जनजातीय समूहों को महाभारत में 'किरात' कहा गया है। ये क्षेत्र मणिपुर के उत्तर और पूर्व में फैले हुए थे।

· बर्मा के साथ संबंध: मणिपुर से आगे बढ़ने पर बर्मा (म्यांमार) के राज्य आते थे, जिनके साथ मणिपुर के घनिष्ठ राजनीतिक, सांस्कृतिक और युद्ध के संबंध रहे, जैसा कि हम बर्मी इतिहास से जानते हैं।

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6. पुस्तक की संरचना और उद्देश्य

(Structure and Objective of the Book)

(लगभग 1 पृष्ठ)

6.1. उद्देश्य

इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है:

1. प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक, भारत की पूर्वी दिशा (प्राची) में स्थित राज्यों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक सुसंगत और विस्तृत विवरण प्रस्तुत करना।

2. भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में इन राज्यों के योगदान को उजागर करना, जिनकी अक्सर उपेक्षा की जाती है।

3. विभिन्न प्रकार के स्रोतों - भारतीय महाकाव्य, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, पुरातात्विक साक्ष्य और स्थानीय ग्रंथों - के समन्वय से एक समग्र इतिहास लिखना।

4. महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करना।

6.2. संरचना

यह पुस्तक तीन प्रमुख खंडों में विभाजित होगी:

· खंड 1: महाभारत काल के पूर्वी राज्य: इस खंड में उन राज्यों का विस्तार से वर्णन होगा जिनका उल्लेख महाभारत में मिलता है।

· खंड 2: मौर्य से गुप्त काल तक के पूर्वी राज्य: इस खंड में इन राज्यों के मौर्य, कुषाण और गुप्त साम्राज्यों के साथ संबंधों और उनके स्वतंत्र विकास का वर्णन होगा।

· खंड 3: मध्यकाल में पूर्वी राज्य: इस खंड में पाल, सेन, कामरूप के वर्मन राजवंश और मणिपुर के निंगथौजा राजवंश जैसे शक्तिशाली राजवंशों का इतिहास होगा।

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7. निष्कर्ष (Conclusion)

(लगभग 1 पृष्ठ)

'प्राची' केवल एक भौगोलिक दिशा नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है जो निरंतर प्रवाहित होती रही है। यह वह मार्ग है, जहाँ से भारत ने न केवल अपने पड़ोसियों को प्रभावित किया, बल्कि स्वयं भी उनसे प्रभावित हुआ। अंग के कर्ण की वीरता से लेकर कलिंग के समुद्री व्यापार तक, और कामरूप के शक्तिशाली राजाओं से लेकर मणिपुर की पुयाओं में संरक्षित ज्ञान तक, प्राची दिशि के राज्य हमारे समृद्ध अतीत के जीवंत प्रमाण हैं।

इस पुस्तक के माध्यम से हमने उन राज्यों की कहानी को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है, जो आज भी हमारे सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग हैं। आशा है कि यह प्रयास पाठकों को प्राची दिशि के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने में सफल होगा।

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8. संदर्भ ग्रंथ सूची (Bibliography)

(यह एक प्रारंभिक सूची है, इसे और विस्तृत किया जा सकता है)

1. महाभारत (गीताप्रेस गोरखपुर संस्करण)

2. वाल्मीकि रामायण

3. कालिका पुराण

4. विष्णु पुराण

5. Xuanzang (Hiuen Tsang). Si-Yu-Ki: Buddhist Records of the Western World. (Translated by Samuel Beal)

6. Phayre, Lt. Gen. Arthur P. History of Burma. (1883)

7. Hodson, T.C. The Meitheis. (1908)

8. चीथरोल कुम्बाबा (मणिपुरी राजवंशावली) का अंग्रेजी/हिंदी अनुवाद।

9. Gogoi, Padmeswar. The Tai and the Tai Kingdoms.

10. Barua, K.L. Early History of Kamarupa.

11. Ray, Nihar Ranjan. Bangaalir Itihaas (बंगाली का इतिहास).

12. मणिपुरी पुयाओं के अंग्रेजी/हिंदी अनुवाद (विभिन्न लेखक)।

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प्राची दिशि के राज्यों का पूर्ण इतिहास (भाग 1: मध्य प्रदेश एवं उड़ीसा क्षेत्र के राज्य) --- 1. चेदि राज्य (Chedi Kingdom) परिचय चेदि महाजनपद प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। यह राज्य वर्तमान मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र और उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयाग) के आसपास फैला हुआ था। इसकी सीमाएँ पूर्व में वत्स, पश्चिम में मालवा, उत्तर में सुरसेन और दक्षिण में उत्कल (उड़ीसा) से लगती थीं। राजधानी · सुक्तिमती (Suktimati): चेदि राज्य की राजधानी का नाम सुक्तिमती या सोत्थिवती था। यह नगर सोन नदी के तट पर बसा हुआ था। महाभारत में इस नगर का वर्णन मिलता है। आधुनिक इतिहासकार इसे वर्तमान मध्य प्रदेश के रीवा या बांदा जिले के आसपास स्थित मानते हैं। महाभारत काल में चेदि राज्य चेदि राज्य का महाभारत में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। 1. राजा उपरिचर वसु (King Uparichara Vasu): चेदि के सबसे प्रसिद्ध प्राचीन राजा उपरिचर वसु थे। वे एक शक्तिशाली और धर्मात्मा राजा थे। महाभारत के अनुसार, इंद्र ने उन्हें एक दिव्य रथ और बांस की एक छड़ी (वेणु) भेंट की थी। उनके नाम पर ही वसु नाम पड़ा। · उनके सात पुत्र थे, जिन्होंने विभिन्न राज्यों की स्थापना की, जिनमें मगध (बृहद्रथ) प्रमुख था। · उनकी पुत्री सत्यवती का विवाह शांतनु से हुआ और वह भीष्म की सौतेली माँ बनीं। सत्यवती ही व्यास की माता भी थीं, जिनसे धृतराष्ट्र और पाण्डु का जन्म हुआ। इस प्रकार, चेदि वंश का कुरु वंश से सीधा संबंध था। 2. राजा शिशुपाल (King Shishupala): चेदि का सबसे प्रसिद्ध राजा शिशुपाल था। वह राजा उपरिचर वसु के वंशज दमघोष का पुत्र था। · जन्म और कथा: शिशुपाल तीन आँखों और चार भुजाओं के साथ पैदा हुआ था। एक आकाशवाणी ने बताया कि जिसकी गोद में डालते ही उसकी अतिरिक्त आँखें और भुजाएँ गायब हो जाएँगी, वही उसका काल होगा। जब उसका मामा श्रीकृष्ण (वसुदेव के पुत्र) ने उसे गोद में लिया, तो वे अतिरिक्त अंग गायब हो गए। शिशुपाल की माँ (श्रुतश्रवा, जो वसुदेव की बहन थी) ने कृष्ण से वचन लिया कि वह शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करेंगे। · युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में: युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अग्रपूजा (सबसे पहले पूजा) के अधिकार को लेकर शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया। उसने कृष्ण को "ग्वाला" कहकर संबोधित किया। जब उसके 100 अपराध पूरे हो गए, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। यह महाभारत की एक प्रसिद्ध घटना है। इतिहास और विस्तार · महाजनपद काल: छठी शताब्दी ईसा पूर्व में चेदि एक शक्तिशाली महाजनपद था। इसकी गणना 16 महाजनपदों में होती थी। · मौर्य काल: मौर्य साम्राज्य के विस्तार के साथ चेदि मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बन गया। · कलिंग युद्ध के बाद: सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के बाद यह क्षेत्र मौर्यों के अधीन रहा। · गुप्त काल: गुप्त साम्राज्य के दौरान यह क्षेत्र समुद्रगुप्त के अधीन आया। संदर्भ ग्रंथ (Reference Books) 1. महाभारत (सभापर्व, राजसूयिक पर्व) - विशेषकर शिशुपाल वध पर्व। 2. अश्वलायन गृह्यसूत्र - में चेदि का उल्लेख। 3. पाणिनि की अष्टाध्यायी - में चेदि शब्द का प्रयोग। 4. दीघ निकाय (बौद्ध ग्रंथ) - महाजनपदों की सूची में चेदि का नाम। 5. Raychaudhuri, H.C. Political History of Ancient India. (University of Calcutta, 1996) - पृष्ठ 85-90। 6. Law, B.C. Tribes in Ancient India. (Bhandarkar Oriental Series, 1973) - पृष्ठ 120-135। --- 2. कलिंग राज्य (Kalinga Kingdom) परिचय कलिंग प्राचीन भारत के सबसे शक्तिशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्यों में से एक था। यह राज्य वर्तमान उड़ीसा (ओडिशा) और आंध्र प्रदेश के उत्तरी भाग में फैला हुआ था। इसकी सीमाएँ पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में छोटा नागपुर पठार, उत्तर में उत्कल और दक्षिण में आंध्र से लगती थीं। राजधानी · तोशली (Tosali): प्राचीन कलिंग की राजधानी तोशली थी, जो वर्तमान भुवनेश्वर के पास स्थित थी। अशोक के शिलालेख यहाँ से प्राप्त हुए हैं। · मुखलिंगम (Mukhalingam): बाद के कलिंग राजवंशों (गंग वंश) की राजधानी मुखलिंगम थी, जो आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित है। महाभारत काल में कलिंग महाभारत में कलिंग का कई बार उल्लेख हुआ है। 1. कलिंग राजा श्रुतायुध (King Shrutayudha): महाभारत युद्ध में कलिंग के राजा श्रुतायुध ने कौरवों की ओर से युद्ध किया था। वह भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों के साथ युद्ध में शामिल था। 2. श्रुतायुष (Shrutayusha): कलिंग के एक अन्य राजा श्रुतायुष का भी उल्लेख है, जो कौरवों की ओर से लड़ा था। 3. सहदेव की दिग्विजय: महाभारत के सभापर्व में वर्णन है कि पांडव सहदेव ने दक्षिण दिशा की दिग्विजय के दौरान कलिंग राज्य को भी जीता था और कलिंग राजा को कर देने के लिए बाध्य किया था। कलिंग का ऐतिहासिक गौरव (क) नंद वंश और कलिंग मौर्यों से पहले, कलिंग पर नंद वंश के सम्राटों ने आक्रमण किया था और संभवतः इसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया था, हालाँकि कलिंग ने जल्दी ही स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी। (ख) कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) - इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ यह कलिंग के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। · कारण: सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया क्योंकि कलिंग एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य था और उसका व्यापारिक महत्व था। · परिणाम: यह युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे भीषण युद्ध माना जाता है। अशोक के शिलालेखों के अनुसार, 1,50,000 लोग बंदी बनाए गए, 1,00,000 मारे गए और उससे कई गुना अधिक घायल हुए। इस युद्ध ने अशोक का हृदय परिवर्तन कर दिया और उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। · महत्व: यह युद्ध कलिंग की स्वतंत्रता का अंत था, लेकिन इसने अशोक को शांति का दूत बना दिया। (ग) खारवेल (Kharavela) - महान कलिंग सम्राट मौर्यों के पतन के बाद, कलिंग में चेदि वंश (जो महाभारत के चेदि राज्य से जुड़ा था) का उदय हुआ। इस वंश का सबसे महान राजा खारवेल (पहली शताब्दी ईसा पूर्व) था। · हाथीगुम्फा शिलालेख: खारवेल की उपलब्धियों का वर्णन भुवनेश्वर के पास उदयगिरि की पहाड़ियों पर स्थित हाथीगुम्फा शिलालेख में मिलता है। · विजयें: उसने उत्तर भारत (मगध) पर आक्रमण किया, पश्चिम में सातवाहनों को हराया और दक्षिण में पांड्य राजाओं को परास्त किया। उसने जैन धर्म का संरक्षण किया और कलिंग को एक शक्तिशाली साम्राज्य बनाया। (घ) गंग वंश (Ganga Dynasty) और सूर्य मंदिर बाद के काल में पूर्वी गंग वंश (11वीं-15वीं शताब्दी) ने कलिंग पर शासन किया। इन्होंने कोणार्क के सूर्य मंदिर का निर्माण कराया, जो वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। संस्कृति और धर्म · जैन धर्म: खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था। हाथीगुम्फा शिलालेख में उसके जैन धर्म के संरक्षण का उल्लेख है। · बौद्ध धर्म: कलिंग में बौद्ध धर्म भी फला-फूला। अशोक के शिलालेख और बौद्ध स्तूप यहाँ पाए गए हैं। · शैव और वैष्णव धर्म: गंग वंश के शासनकाल में शैव और वैष्णव धर्म को राजकीय संरक्षण मिला। लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर) और जगन्नाथ मंदिर (पुरी) इसी परंपरा के प्रतीक हैं। संदर्भ ग्रंथ (Reference Books) 1. महाभारत (सभापर्व, भीष्मपर्व) - कलिंग राजाओं का उल्लेख। 2. हाथीगुम्फा शिलालेख (खारवेल का अभिलेख) - मूल स्रोत। 3. अशोक के शिलालेख (XIIIवाँ शिलालेख) - कलिंग युद्ध का वर्णन। 4. दिव्यावदान (बौद्ध ग्रंथ) - अशोक और कलिंग युद्ध की कथा। 5. Raychaudhuri, H.C. Political History of Ancient India. (University of Calcutta, 1996) - पृष्ठ 215-235 (खारवेल पर)। 6. Sahu, N.K. Kalinga Under the Bhauma Kings. (Bharti Prakashan, 1978)। 7. Majumdar, R.C. Ancient India. (Motilal Banarsidass, 1994) - पृष्ठ 150-165। --- 3. उत्कल राज्य (Utkala Kingdom) परिचय उत्कल राज्य कलिंग के उत्तर में स्थित एक प्राचीन राज्य था। यह वर्तमान उड़ीसा (ओडिशा) के उत्तरी भाग में फैला हुआ था। उत्कल शब्द का अर्थ "उत्कृष्ट कला" या "उत्तम कला" से जोड़ा जाता है, जो यहाँ की कलात्मक परंपरा को दर्शाता है। राजधानी · **उत्कल की राजधानी का नाम अलग-अलग काल में बदलता रहा। प्रारंभिक काल में यह संभवतः जाजपुर (Jajpur) या कटक (Cuttack) के आसपास थी। महाभारत काल में उत्कल उत्कल का उल्लेख महाभारत और रामायण दोनों में मिलता है। 1. उत्कल राजा महाभारत युद्ध में: महाभारत युद्ध में उत्कल के राजा ने कौरवों की ओर से युद्ध किया था। भीष्म पर्व में उत्कल के योद्धाओं का उल्लेख है जो कौरव सेना में शामिल थे। 2. सहदेव की दिग्विजय: सहदेव ने अपनी दक्षिण दिशा की दिग्विजय में उत्कल को भी जीता था। 3. वन पर्व में उल्लेख: वन पर्व में भी उत्कल का उल्लेख एक समृद्ध राज्य के रूप में किया गया है। इतिहास और विस्तार (क) मौर्य काल मौर्य सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के बाद उत्कल को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया था। अशोक के शिलालेख (जैसे धौली, जौगढ़) उत्कल के क्षेत्र में पाए गए हैं, जो बताता है कि यह मौर्य साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण प्रांत था। (ख) खारवेल काल प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में खारवेल ने उत्कल को भी जीत लिया था। हाथीगुम्फा शिलालेख में उल्लेख है कि उसने उत्कल के राजा को हराया और उसे कर देने के लिए बाध्य किया। (ग) गुप्त काल और बाद का इतिहास गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, उत्कल क्षेत्र पर स्थानीय राजवंशों का शासन हुआ। · भौम वंश (Bhauma Dynasty): 8वीं-10वीं शताब्दी में भौम वंश ने उत्कल सहित पूरे उड़ीसा पर शासन किया। उन्होंने बौद्ध धर्म और तांत्रिक परंपराओं को संरक्षण दिया। · सोमवंशी (Somavanshi Dynasty): 10वीं-11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजाओं ने उत्कल पर शासन किया। उन्होंने लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर) का निर्माण शुरू कराया। · गंग वंश (Ganga Dynasty): 11वीं-15वीं शताब्दी में गंग वंश ने उत्कल और कलिंग को एकीकृत किया और पूरे उड़ीसा पर शासन किया। उत्कल की सांस्कृतिक विरासत उत्कल क्षेत्र (उड़ीसा) अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है: · जगन्नाथ संस्कृति: पुरी का जगन्नाथ मंदिर उत्कल की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है। · वास्तुकला: लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर), कोणार्क का सूर्य मंदिर, और जगन्नाथ मंदिर उत्कल की वास्तुकला के अद्भुत नमूने हैं। · साहित्य: उत्कल में ओड़िया भाषा और साहित्य का विकास हुआ। सारलादास ने ओड़िया में महाभारत की रचना की। संदर्भ ग्रंथ (Reference Books) 1. महाभारत (भीष्मपर्व, सभापर्व)। 2. अशोक के शिलालेख (धौली, जौगढ़)। 3. हाथीगुम्फा शिलालेख। 4. Majumdar, R.C. History of Orissa. (University of Calcutta, 1960)। 5. Sahu, N.K. Buddhism in Orissa. (Utkal University, 1958)। 6. Panigrahi, K.C. History of Orissa: Hindu Period. (Kitab Mahal, 1981)। 4. वंग राज्य (Vanga Kingdom) परिचय वंग राज्य प्राचीन भारत के सबसे समृद्ध और ऐतिहासिक राज्यों में से एक था। यह राज्य वर्तमान पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के दक्षिणी भाग में फैला हुआ था। वंग का समुद्री व्यापार दक्षिण-पूर्व एशिया (सुवर्णभूमि) तक फैला हुआ था। यहीं से 'बंगाल' नाम की उत्पत्ति हुई - वंग से बंग, बंगाल, और बांग्ला। भौगोलिक विस्तार · उत्तर: गंगा नदी (पद्मा) · दक्षिण: बंगाल की खाड़ी · पूर्व: मेघना नदी · पश्चिम: वर्तमान हुगली जिला राजधानी · गंगासागर (Gangasagar): प्राचीन काल में वंग की राजधानी गंगासागर (जहाँ गंगा सागर में मिलती है) के आसपास थी। · कदली (Kadali): कुछ पुराणों में वंग की राजधानी कदली का उल्लेख मिलता है। महाभारत काल में वंग (क) वंग राजाओं की भूमिका महाभारत युद्ध में वंग के राजाओं ने कौरवों की ओर से युद्ध किया था। 1. वंग राजा समुद्रसेन (King Samudrasena): भीष्म पर्व के अनुसार, वंग के राजा समुद्रसेन ने अपनी विशाल सेना के साथ कौरवों का साथ दिया था। 2. अन्य वंग योद्धा: वंग, पुण्ड्र और किरात राजाओं के साथ मिलकर कौरव सेना में शामिल हुए थे। (ख) सहदेव की दिग्विजय सहदेव ने दक्षिण दिशा की दिग्विजय के दौरान वंग राज्य को भी जीता था और वंग राजा को कर देने के लिए बाध्य किया था। (ग) भीम की दिग्विजय भीम ने भी पूर्व दिशा की दिग्विजय के दौरान वंग राज्य पर आक्रमण किया था और वहाँ के राजा को हराया था। ऐतिहासिक काल में वंग (क) मौर्य काल (4th-2nd Century BCE) मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक ने वंग को मौर्य साम्राज्य में मिला लिया था। अशोक के शिलालेख वंग क्षेत्र में नहीं मिले हैं, लेकिन बौद्ध ग्रंथों में वर्णन है कि अशोक ने वंग में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया था। (ख) शुंग और कण्व काल (2nd-1st Century BCE) मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद वंग स्वतंत्र हो गया। (ग) गुप्त काल (4th-6th Century CE) समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिणापथ अभियान के दौरान वंग पर आक्रमण किया था। इलाहाबाद स्तंभ लेख (प्रयाग प्रशस्ति) में वंग का उल्लेख एक सीमावर्ती राज्य के रूप में किया गया है जो गुप्त साम्राज्य को कर देता था। वंग के प्रसिद्ध राजवंश 1. खड़ग वंश (Kharga Dynasty) - 7वीं शताब्दी यह वंग का पहला प्रसिद्ध स्वतंत्र राजवंश था। · राजा खड़गोद्दम (King Khargodamma): इस वंश का संस्थापक। · राजा राजभट्ट (King Rajabhatta): शक्तिशाली शासक, जिसने वंग की सीमाओं का विस्तार किया। · धर्म: खड़ग वंश के राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। 2. देव वंश (Deva Dynasty) - 8वीं-9वीं शताब्दी · राजा देवखड़ग (King Devakhadga): इस वंश का प्रमुख शासक। · राजधानी: देवपर्वत (वर्तमान मैनामती, कुमिल्ला, बांग्लादेश)। 3. चन्द्र वंश (Chandra Dynasty) - 10वीं-11वीं शताब्दी यह वंग का सबसे शक्तिशाली राजवंश था, जिसने पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) पर शासन किया। · राजा श्रीचन्द्र (King Shrichandra): (930-975 CE) इस वंश का सबसे महान शासक। उसने अपनी राजधानी विक्रमपुर (वर्तमान मुंशीगंज, बांग्लादेश) में स्थापित की। उसने बौद्ध धर्म का संरक्षण किया और अनेक विहारों का निर्माण करवाया। · राजा कल्याणचन्द्र (King Kalyanachandra): (975-1000 CE) श्रीचन्द्र का पुत्र। उसने विक्रमपुर में प्रसिद्ध विक्रमपुर विहार की स्थापना की। · राजा लडहचन्द्र (King Ladahachandra): (1000-1020 CE) अंतिम शक्तिशाली चन्द्र शासक। 4. वर्मन वंश (Varman Dynasty) - 11वीं शताब्दी चन्द्र वंश के पतन के बाद वर्मन वंश ने वंग पर शासन किया। · राजा जातवर्मन (King Jatavarman): इस वंश का प्रमुख शासक। वंग का समुद्री व्यापार वंग की सबसे बड़ी विशेषता इसका समुद्री व्यापार था। · सुवर्णभूमि से व्यापार: वंग के व्यापारी जावा, सुमात्रा, मलय प्रायद्वीप और बोर्नियो (सुवर्णभूमि) तक जाते थे। · बंदरगाह: वंग के प्रमुख बंदरगाह ताम्रलिप्ति (Tamluk, वर्तमान मेदिनीपुर) और चन्द्रद्वीप थे। · व्यापारिक वस्तुएँ: रेशम, मलमल, हाथी दांत, मसाले, और कीमती पत्थरों का निर्यात होता था। संस्कृति और धर्म · बौद्ध धर्म: वंग में बौद्ध धर्म का विशेष प्रचलन था। अनेक बौद्ध विहार और शिक्षा केंद्र यहाँ स्थापित हुए। · तांत्रिक बौद्ध धर्म (वज्रयान): वंग में वज्रयान बौद्ध धर्म का विकास हुआ। सहजयान के प्रसिद्ध सिद्धाचार्य (जैसे लुइपाद, कण्हपाद) वंग के निवासी थे। · हिन्दू धर्म: बाद के काल में पूर्वी गंग वंश और सेन वंश के शासनकाल में हिन्दू धर्म (वैष्णव और शैव) को राजकीय संरक्षण मिला। संदर्भ ग्रंथ (Reference Books) 1. महाभारत (भीष्मपर्व, सभापर्व, द्रोणपर्व)। 2. इलाहाबाद स्तंभ लेख (समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति)। 3. चन्द्र वंश के ताम्रपत्र शिलालेख (Mainamati Plates, Paschimbhag Plates)। 4. तिब्बती इतिहासकार तारानाथ का वृत्तांत - बौद्ध धर्म के इतिहास पर। 5. Majumdar, R.C. History of Ancient Bengal. (G. Bharadwaj & Co., 1971) - पृष्ठ 145-178। 6. Ray, Nihar Ranjan. Bangalir Itihaas: Adi Parva. (Deys Publishing, 1993) - पृष्ठ 210-255 (बंगाली भाषा में)। 7. Chowdhury, A.M. Dynastic History of Bengal. (Asiatic Society of Pakistan, 1967) - पृष्ठ 90-120। 8. Eaton, Richard M. The Rise of Islam and the Bengal Frontier, 1204-1760. (University of California Press, 1993) - पृष्ठ 1-25 (प्रारंभिक इतिहास के लिए)। ---